‘माला फेरत जुग भया, मिटा न मन का फेर, कर का मनका छांड़ि कै, मन का मनका फेर।’ इस दोहे का भाव स्पष्ट कीजिए।

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‘माला फेरत जुग भया, मिटा न मन का फेर, कर का मनका छांड़ि कै, मन का मनका फेर।’ इस दोहे का भाव स्पष्ट कीजिए।

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यहाँ आपके प्रश्नों के उत्तर दिए गए हैं:

  1. 'माला फेरत जुग भया, मिटा न मन का फेर, कर का मनका छाड़ि कै, मन का मनका फेर।' इस दोहे का भाव स्पष्ट कीजिए। इस दोहे का भाव यह है कि व्यक्ति जीवन भर हाथ में माला लेकर ईश्वर का नाम जपता रहता है, लेकिन उसके मन के भीतर के बुरे विचार और भ्रम दूर नहीं होते। कबीरदास जी कहते हैं कि बाहरी दिखावे की भक्ति छोड़कर, व्यक्ति को अपने मन के विचारों को शुद्ध करना चाहिए और अपने मन को एकाग्र करके ईश्वर का स्मरण करना चाहिए। सच्ची भक्ति मन की शुद्धता में है, न कि बाहरी कर्मकांड में।

  2. कवि वृंद के अनुसार भले-बुरे की पहचान कब होती है? कवि वृंद के अनुसार, व्यक्ति के भले या बुरे होने की पहचान उसके विपत्ति के समय होती है। जब व्यक्ति पर कोई संकट आता है, तभी उसके सच्चे स्वभाव और चरित्र का पता चलता है कि वह कितना धैर्यवान, सच्चा और सहायक है।

  3. रहीम ने अपने दोहे में ऐसा क्यों कहा है कि किसी से कुछ नहीं रहीम ने ऐसा इसलिए कहा है क्योंकि वे मानते थे कि किसी से कुछ माँगना या उम्मीद रखना व्यक्ति के स्वाभिमान को कम करता है। उनका मानना था कि व्यक्ति को आत्मनिर्भर होना चाहिए और दूसरों से सहायता की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए, खासकर उन लोगों से जो वास्तव में मदद करने में सक्षम या इच्छुक न हों।

  4. कबीर ने ऐसा क्यों कहा है कि किसी भी चीज को तुच्छ नहीं कबीर ने ऐसा इसलिए कहा है क्योंकि उनका मानना था कि संसार में कोई भी वस्तु तुच्छ या बेकार नहीं होती। हर छोटी से छोटी चीज़ का अपना महत्व होता है और वह समय आने पर बड़ी समस्या का कारण बन सकती है, जैसे पैर के नीचे का तिनका भी आँख में पड़ जाए तो बहुत पीड़ा देता है।

  5. रहीम ने दीपक और कपूत को एक जैसा क्यों बताया है? रहीम ने दीपक (दीये) और कपूत (बुरे पुत्र) को एक जैसा इसलिए बताया है क्योंकि दोनों ही शुरुआत में उजाला (खुशी) देते हैं, लेकिन बढ़ने पर (दीपक जलकर बुझने पर, कपूत बड़ा होने पर) अँधेरा (दुःख) फैलाते हैं। दीपक जलते-जलते तेल खत्म होने पर बुझ जाता है और कपूत बड़ा होकर कुल का नाम डुबोता है।

  6. 'सबै सहायक सबल के, कोउ न निबल सहाय। पवन जगावत आग कौ, दीपहिं देत बुझाय।।' इस दोहे का भाव स्पष्ट कीजिए? इस दोहे का भाव यह है कि संसार में सभी लोग शक्तिशाली का साथ देते हैं और कमजोर की कोई सहायता नहीं करता। जिस प्रकार हवा (पवन) तेज आग को और भड़का देती है, लेकिन एक छोटे से दीपक को बुझा देती है, उसी प्रकार बलवान को और बल मिलता है और निर्बल को कोई सहारा नहीं मिलता।

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