Loksahity ki sngna,swarupp,lakshan

Folklore

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लोक साहित्य की संज्ञा, स्वरूप और लक्षण इस प्रकार हैं:

संज्ञा (Definition):
लोक साहित्य वह साहित्य है जिसका सृजन लोक (जनसाधारण) द्वारा होता है और जो मौखिक परंपरा के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित होता है। यह किसी एक व्यक्ति की रचना न होकर पूरे समाज की सामूहिक अभिव्यक्ति होता है।

स्वरूप (Nature/Form):
लोक साहित्य का स्वरूप मौखिक, सामूहिक और सहज होता है। यह लिखित परंपरा से भिन्न होता है और इसमें लोक जीवन के अनुभव, भावनाएँ, विश्वास, रीति-रिवाज और परंपराएँ स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्त होती हैं। इसका कोई निश्चित लेखक नहीं होता और यह समय के साथ बदलता रहता है।

लक्षण (Characteristics):

  1. मौखिकता (Oral Tradition): यह मुख्य रूप से मौखिक रूप से प्रचलित होता है।
  2. सामूहिकता (Collective Creation): इसका कोई एक लेखक नहीं होता, बल्कि यह पूरे समाज की सामूहिक रचना मानी जाती है।
  3. परिवर्तनशीलता (Variability): मौखिक परंपरा के कारण इसमें समय और स्थान के अनुसार परिवर्तन होते रहते हैं।
  4. सहजता और सरलता (Spontaneity and Simplicity): इसकी भाषा और शैली सरल, सहज और आडंबरहीन होती है।
  5. लोक जीवन का प्रतिबिंब (Reflection of Folk Life): यह लोक जीवन के सुख-दुख, आशा-निराशा, रीति-रिवाज और विश्वासों का सच्चा दर्पण होता है।
  6. अनाम रचना (Anonymous Authorship): इसके रचयिता का नाम अज्ञात होता है।
  7. परंपरागतता (Traditional): यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता है और परंपराओं का वाहक होता है।
  8. व्यापकता (Universality): यह किसी विशेष वर्ग तक सीमित न होकर पूरे जनसमुदाय में प्रचलित होता है।
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