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विवे ज्ञान की आँधी, आई।" - इस पंक्ति में कवि क्या कहना चाहता है?

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  1. पद (2) का विस्तृत अर्थ

    यह पद कबीर दास द्वारा रचित है। इसमें कबीर कहते हैं कि जब ज्ञान की आँधी आती है, तो अज्ञानता और भ्रम के सभी बंधन टूट जाते हैं। जिस प्रकार आँधी में छप्पर की टाटी उड़ जाती है, उसी प्रकार माया (सांसारिक मोह) अब व्यक्ति को बांध नहीं पाती।

  2. आगे की पंक्तियों का अर्थ

    कबीर आगे कहते हैं कि ज्ञान की आँधी से हिति (स्वार्थ या लगाव) और चित्त (मन की चंचलता या द्वैत भाव) रूपी दो खंभे (थूनी) गिर जाते हैं। इन खंभों पर टिका हुआ मोह (गहरा लगाव या आसक्ति) रूपी बलिंडा (छप्पर की मुख्य लकड़ी) भी टूट जाता है। इसका अर्थ है कि ज्ञान प्राप्त होने पर व्यक्ति के स्वार्थ, मन की चंचलता और सभी प्रकार के मोह समाप्त हो जाते हैं।

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